​ ​ राजनीति में नहीं, भारतीय सेना में जाना चाहता थे सत्यव्रत चतुर्वेदी
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राजनीति में नहीं, भारतीय सेना में जाना चाहता थे सत्यव्रत चतुर्वेदी

Friday, March 30, 2018 17:55:36 PM , Viewed: 4098
  • भोपाल: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी राजनीति में जाने को तैयार नहीं थे। वह सेना में जाकर देश के दुश्मनों से लड़ना चाहते थे, मगर मां की इच्छा पर उन्होंने राजनीति में जाने का फैसला किया।

    भोपाल, 29 मार्च (आईएएनएस)। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी राजनीति में जाने को तैयार नहीं थे। वह सेना में जाकर देश के दुश्मनों से लड़ना चाहते थे, मगर मां की इच्छा पर उन्होंने राजनीति में जाने का फैसला किया।

    राज्यसभा सदस्य का कार्यकाल आगामी कुछ दिनों में पूरा करने जा रहे सांसद सत्यव्रत ने फोन पर आईएएनएस के साथ अपने जीवन के बारे में खुलकर बातचीत की।

    रीवा के सैनिक स्कूल के विद्यार्थी रहे सत्यव्रत की इच्छा सेना में जाने की थी। उन्होंने सैन्य अधिकारी की परीक्षा भी पास कर ली थी। लेकिन उनके पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, और मां की इच्छा थी कि वह (सत्यव्रत) सेना में न जाकर राजनीति में जाएं और क्षेत्र के विकास के साथ ही देश के गरीबों के हित में काम करें।

    लेकिन सत्यव्रत दिल, दिमाग और अपनी कार्यशैली से राजनीति में भी एक सैनिक की ही तरह रहे। उन्होंने कहा, “स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माता-पिता ने मानवीय मूल्यों के साथ वे संस्कार दिए, जिसके कारण मैंने आत्मसम्मान के साथ अपनी शर्तो पर राजनीति कर सका। कई नेताओं के साथ काम करने का मौका मिला, पिता-माता के बाद अगर मैं सबसे ज्यादा किसी का आभारी हूं तो वह सोनिया गांधी हैं। वह किसी पद पर रहें या न रहें, मगर मेरे जीवन के अंत तक वही मेरी नेता होंगी।”

    सत्यव्रत वर्ष 1978 में पहली बार नगर पालिका पार्षद चुने गए। उसके बाद मध्य प्रदेश विधानसभा के लिए दो बार (1980-84, 1993-97) निर्वाचित हुए, राज्य के उपमंत्री (1983-84) बने, लोकसभा (1999-2004) के लिए निर्वाचित हुए, फिर दो बार राज्यसभा (2006 और 2012) के लिए निर्वाचित हुए। और अब राजनीति से संन्यास की तैयारी है।

    एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “मैंने दो दशक पहले ही तय कर लिया था कि 65 वर्ष की आयु पूरी करते ही सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लूंगा। इसलिए अब न तो कोई चुनाव लडूंगा, न पार्टी का कोई पद संभालूंगा।”

    मध्य प्रदेश की सियासत में सत्यव्रत अपने तल्ख तेवर और साफगोई के कारण कई नेताओं के निशाने पर रहे हैं। उन्होंने कभी समझौते की राजनीति नहीं की। उन्होंने एक बार मध्य प्रदेश सरकार में उपमंत्री का पद छोड़ दिया था और बाद में राजनीति से दूर हो गए थे। माधवराव सिंधिया की पहल पर उन्होंने सोनिया गांधी से सीधे चर्चा की और उसके बाद लोकसभा का चुनाव लड़ा था और खजुराहो संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित भी हुए थे।

    आगामी योजना के बारे में चतुर्वेदी ने कहा, “अपने क्षेत्र यानी बुंदेलखंड के छतरपुर पहुंचकर, साथियों से चर्चा करेंगे कि क्या करना चाहिए। उनकी राय के आधार पर आगे कदम बढ़ाऊंगा। फिलहाल कुछ तय नहीं है। इतना तय है कि न तो कोई पद लूंगा और न ही चुनाव लड़ूंगा।”

    सत्यव्रत ने आज की राजनीति से काफी चिंतित हैं। उन्होंने कहा, “राजनीति का स्तर गिर रहा है, सेना के हथियार खरीदी तक को राजनीति का मुद्दा बनाया जाता है। मैंने अपने सदन के विदाई उद्बोधन में इस बात का जिक्र भी किया है कि हथियार खरीदी को विवाद का विषय न बनाया जाए।”

    उन्होंने आगे कहा, “बोफोर्स तोप खरीदी को लेकर पैदा किए गए विवाद का नतीजा यह हुआ कि पूरे मंत्रालय का कोई भी खरीददारी की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता है। सब डरते हैं कि कहीं कोई आरोप न लग जाए। इसी कारण से एक-एक सौदे में 10-15 साल लग रहे हैं। हम विदेशों से कोई उपकरण या हथियार नहीं खरीद पा रहे हैं। इसका देश की सुरक्षा तैयारियों पर गंभीर असर पड़ रहा है। विवाद का नतीजा यह हुआ है कि बोफोर्स के बाद कोई हथियार नहीं खरीद पाए हैं।”

Reporter : ArunKumar,
RTI NEWS


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