​ ​ सोनभद्र नरसंहार : राष्ट्रपति को पत्र लिखकर जिला प्रशासन पर लापरवाही का आरोप
Monday, October 21, 2019 | 9:34:41 AM

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सोनभद्र नरसंहार : राष्ट्रपति को पत्र लिखकर जिला प्रशासन पर लापरवाही का आरोप

Friday, July 19, 2019 19:39:55 PM , Viewed: 4630
  •  सोनभद्र, 19 जुलाई | सोनभद्र में हुए नरसंहार मामले में स्थानीय मानवाधिकार संगठन पिपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखकर जिला प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया है।

      पीयूसीएल के राष्ट्रीय काउंसिल सदस्य विकास शाक्य ने पत्र में कहा कि अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को जानते हुए भी समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की।

    पत्र में आरोप लगाते हुए मांग की गई है कि जिलाधिकारी (आईएएस) अंकित कुमार अग्रवाल व पुलिस अधीक्षक (आईपीएस) सलमान ताज पाटिल को तुरंत बर्खास्त किया जाए। इसके साथ ही 10 लोगों की हुई सामूहिक हत्या की न्यायिक जांच कराने की मांग की गई है।

    संगठन की ओर से मृतक के परिजनों को 20-20 लाख रुपये जबकि घायलों को पांच-पांच लाख रुपये देने की मांग की गई है। मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने राष्ट्रपति से अपील की है कि सोनभद्र जिले में जमीनों के समान बंटवारे के लिए एक भूमि आयोग बनाया जाए और नए जमींदारों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाए। इसी के साथ विवादित जमीन को गांव के प्रधान व अन्य लोगों को बेचने वाले बिहार निवासी व बंगाल कैडर के आईएएस अफसर प्रभात कुमार मिश्रा के खिलाफ आपराधिक अभियोग दर्ज कर जेल भेजने की अपील भी की गई है।

    सोनभद्र में घोरावल थाना क्षेत्र के उधा गांव के ग्राम प्रधान ने एक आईएएस अधिकारी से खरीदी गई 90 बीघा जमीन पर कब्जे के लिए बड़ी संख्या में अपने साथियों के साथ पहुंचकर जमीन जोतने की कोशिश की। इसका विरोध करने पर उसकी तरफ के लोगों ने स्थानीय ग्रामीणों पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दी। इस वारदात में नौ लोगों की मौके पर ही मौत हो गई जबकि एक घायल ने बाद में दम तोड़ दिया। मामले में 18 अन्य लोग जख्मी हो गए थे।

    पीयूसीएल ने कहा कि उत्तर प्रदेश में जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम के लागू होने के बाद जमींदारों की जमीनें आम लोगों में बांट देनी थी लेकिन कुछ सामंतों और अफसरों ने मिलीभगत कर इन जमीनों को अपने लोगों या ट्रस्ट अथवा सोसाइटी के नाम कर दी।

    संगठन ने कहा कि आईएएस प्रभात कुमार मिश्रा ने 1995 में अपने ससुर के नाम से ट्रस्ट बनाकर तकरीबन 600 से 700 बीघा जमीन दर्ज करा ली जबकि आजादी के समय से ही इन जमीनों पर गोड़ एवं अन्य जातियों का जोत-कोड़ कब्जा था और यह आज तक है। इसी जमीन में से 200 बीघा जमीन प्रभात कुमार ने अपनी पत्नी और बेटी के नाम से करा लिया और बाद में गांव के प्रधान एवं गुर्जर जाति के अन्य लोगों को बेच दिया। गुर्जर समुदाय के लोग आदिवासियों की इस पुश्तैनी जमीन पर पहले भी कब्जे की कोशिश कर चुके हैं जिसमें झड़पें हो चुकी हैं और अब 90 बीघा जमीन पर कब्जे की कोशिश की वजह से यह नरसंहार हुआ एवं जिला प्रशासन मूकदर्शक बना रहा।

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