​ ​ चिपको आंदोलन: 21 पहाड़ी औरतों ने उड़ा दी थी इंदिरा गांधी की नींद..!
Friday, July 20, 2018 | 4:14:01 PM

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चिपको आंदोलन: 21 पहाड़ी औरतों ने उड़ा दी थी इंदिरा गांधी की नींद..!

Monday, March 26, 2018 21:48:09 PM , Viewed: 2897
  • मुंबई: गूगल ने चिपको आंदोलन की 45वीं वर्षगांठ पर सोमवार को एक अच्छा-सा डूडल बनाया है। चिपको आंदोलन 1973 में दुनिया का एक सबसे प्रभावशाली गैर राजनीतिक पर्यावरण संरक्षण आंदोलन था। इस आंदोलन के लिए चंडी प्रसाद भट्ट ने लोगों को प्रेरित किया था। गूडल (गूगल व डूडल) का चित्रण आंदोलन का नेतृत्व करने वाली गौरा देवी की वास्तविक तस्वीर से बनाया गया है।

    उत्तराखंड के रेनी गांव में पेड़ काटने वालों का एक समूह पहुंचा था। गौरा देवी अपनी सहेलियों के एक समूह के साथ तुरंत पेड़ कटाई वाली जगह पर पहुंच गईं और पेड़ काटने वालों के अपशब्दों व उनकी बंदूकों की परवाह किए बिना उन्होंने पेड़ों को घेर लिया और पूरी रात पेड़ों से 'चिपकी' रहीं।

    अगले दिन यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई और आसपास के गांवों में पेड़ों को बचाने के लिए लोग पेड़ों से चिपकने लगे। चार दिनों के टकराव के बाद पेड़ काटने वालों ने पेड़ों को छोड़ दिया और पेड़ों को बचा लिया गया।

    इस डूडल को स्वभू कोहली व विप्लव सिंह ने बनाया है। इसमें चार महिलाएं दिखाई गई हैं। इसमें गौरा देवी, सुदेशा देवी, बच्ची देवी शमिल हैं, जिन्होंने रात भर जंगल में एक बड़े पेड़ को घेर रखा था।

    भट्ट ने गांधीवादी शैली में अहिंसक रूप से हिमालय की तलहटी में गढ़वाल क्षेत्र में चिपको आंदोलन शुरू किया था। इसकी शुरुआत विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई के विरोध में की गई थी।

    क्या है 'चिपको आंदोलन':
    'चिपको', जैसा कि उसके नाम से ही स्पष्ट है, पेड़ों से चिपककर रहने वाला आंदोलन था. गांधीजी के सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांत पर चलता यह आंदोलन 'प्राण जाए पर पेड़ न जाए' की भावना को मानता था. उत्तराखंड (उस वक्त उत्तर प्रदेश) के पहाड़ों से शुरू हुए इस आन्दोलन ने जल्द ही देशभर में जंगलों के काटे जाने के खिलाफ देशव्यापी मुहीम छेड़ दी थी. सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी, बचनी देवी, चंडी प्रसाद भट आदि इस आंदोलन से जुड़े हुए बड़े और प्रमुख नाम थे.

    पहाड़ी राज्यों में जीवन-यापन का सबसे बड़ा साधन वहां के जंगल ही हैं. खेती लायक जमीन का आभाव होने के कारण ईंधन, चारा और घरेलू इस्तेमाल की वस्तुएं पहाड़ी आबादी को घने जंगलों से ही मिलती है. साल 1927 में भारत में पहली बार 'वन अधिनियम' लागू किया गया था. उस दौरान देश में अंग्रेजों का राज्य था. इस अधिनियम में कई प्रावधान ऐसे थे जो पहाड़ी और जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के हितों के खिलाफ थे. इस अधिनियम के विरोध में 1930 को पहली बड़ी रैली टिहरी में आयोजित की गई थी. इसके बाद समय-समय पर लोगों ने इसका विरोध जारी रखा, लेकिन इसका बड़ा असर 1970 के दशक में नजर आया.

    वन अधिनियम,1927 के अंतर्गत पहाड़ी इलाके की जमीनें मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले कांट्रेक्टरों को बेचीं जाने लगीं. पेड़ काटने लगे और इसी कारण भूस्खलन की बड़ी समस्या पैदा हो गई. जुलाई 1970 में अलकनंदा नदी में आई बाढ़ इसी भूस्खलन का नातीला थी जिसने हनुमानचट्टी बद्रीनाथ से लेकर 350 किलोमीटर नीचे हरिद्वार तक के क्षेत्र को तहस-नहस कर दिया था. इस घटना ने बहुत बड़े स्तर पर लोगों को विचलित कर दिया था.

    साल 1972 में वन विभाग ने 300 पेड़ों को काटने और टेनिस रैकेट बनाने का कॉन्ट्रैक्ट इलाहबाद स्थित साइमन कंपनी को दे दिया. क्षेत्र में इसका घना विरोध हुआ, जिसके बाद यह कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया. हालांकि वन-विभाग ने बहुत चालाकी से जनवरी 1974 में 2,500 पेड़ों की कटाई का कॉन्ट्रैक्ट दे दिया. गांव के लोगों ने बड़ी संख्या में इसका विरोध किया.

    लेकिन इसी बीच गांव के सभी आदमियों को रेनी गांव से कुछ दूर चमोली नुक्सान की भरपाई देने के लिए बुलाया गया. अब गांव में सिर्फ महिलाएं थीं. परिस्थिति का फायदा उठाते हुए मजदूर पेड़ काटने गांव पहुंच गए. तारिख थी 26 मार्च 1974. गांव की एक बच्ची ने पेड़ काटने आ रहे लोगों को देख लिया और गांव की एक महिला गौरा देवी को इसकी जानकारी दी.

    गौरा देवी ने गांव की 21 महिलाओं को इकठ्ठा किया और जंगल पहुंच गईं. सभी औरतें और बच्चे पेड़ों से चिपक गए. ठेकेदारों और मजदूरों ने उन्हें डराने की बहुत कोशिश की, लेकिन ये महिलाएं मजबूती से अपनी जान जोखिम में डालते हुए पेड़ों से चिपकी रहीं. एक के बाद एक सैकड़ों महिलाएं इकट्ठी होती गईं और जंगल के सभी पेड़ों से चिपकती गईं. इतनी बड़ी तादाद में महिलाओं को देखकर ठेकेदार पेड़ नहीं काट सके और उन्हें खाली हाथ जाना पड़ा.

    अलकनंदा की घाटी में शुरू हुआ यह 'चिपको आंदोलन' जल्द ही दूसरे पहाड़ी इलाकों में भी फैल गया. अल्मोड़ा, नैनीताल और दूसरे स्थानों पर आंदोलनकारियों ने जंगलों की नीलामी को रुकवाया. सुन्दरलाल बहुगुणा इस आंदोलन का बड़ा नाम बन कर उभरे. उन्होंने टिहरी में इस आंदोलन की शुरुआत की. 1981 से लेकर 1983 तक उन्होंने 5000 किलोमीटर की पैदल यात्रा की और हिमालय के गांवों में लोगों को जागरूक किया. कुमाऊं और गढ़वाल के छोटे-छोटे गांवों में भी इसी तर्ज पर आंदोलन होते रहे.

    और बंद हुई जंगलों की नीलामी:
    आखिरकार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पहाड़ी इलाके में पेड़ों की कटाई और जंगलों की नीलामी पर 20 साल की रोक लगा दी. 1987 में चिपको आंदोलन को 'सम्यक जीविका पुरस्कार' से नवाजा गया. घनश्याम रतूरी उस दौर के कवि थे जिन्हें 'चिपको कवि' के नाम से जाना गया और आज भी उनके लिखे और गाए गीत पहाड़ों में गाए जाते हैं. इस आंदोलन के बड़े नाम सुन्दरलाल बहुगुणा को साल 2009 में 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया. वहीं चंडी प्रसाद भट्ट को 'रामन मैग्सेसे पुरस्कार' से साल 1982 में सम्मानित किया गया था.

    चिपको आंदोलन का स्लोगन हैः
    'क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार.
    मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार.'



    बॉलीवुड ने पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर फिल्म बनाने की कोई बड़ी कोशिश नहीं की है. लेकिन कई फुटकर कोशिशें होती रही हैं, और उन्हें समय-समय पर सराहा भी जाता रहा है. 'चिपको आंदोलन' से हमें सबक मिलता है कि समय रहते हम चेत गए तो ठीक नहीं तो विनाश का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि पेड़ पृथ्वी की लाइफलाइन हैं और अगर यही नहीं रहे तो कुछ नहीं बचने वाला. पेड़ हैं तो वर्षा है, वर्षा है तो जल है, उसी तरह पेड़ हैं तो प्रदूषण को जीता जा सकता है नहीं तो धरती को रेगिस्तान बनने से कोई नहीं रोक सकता. आइए नजर डालते हैं बॉलीवुड की ऐसी ही पांच फिल्मों पर जिनमें पर्यावण बचाने का संदेश कुछ इस तरह दिया गया हैः
    1. अ फ्लाइंग जट्ट (2016):
    फिल्म की कहानी एक सुपरहीरो की है जिसे एक पेड़ को बचाना है लेकिन विलेन इस पेड़ समेत पूरे इलाके को अपनी जद में लेना चाहता है. हालांकि फिल्म पूरी तरह कॉमर्शियल है लेकिन इसमें पर्यावरण और पेड़ों के महत्व की बात भी की जाती है.

    2. कड़वी हवा (2017): 
    ये फिल्म बुंदलेखंड इलाके में सूखे की बात कहती है और तेजी से खत्म हो रहे गांवों की बात भी करती है. अगर गांव खत्म होंगे और शहर बढ़ेंगे तो जाहिर है, संसाधनों पर प्रेशर बढ़ेगा और उनका संकट पैदा होगा. इस फिल्म को भी नील माधब पांडा ने डायरेक्ट किया था.

    3. द विशिंग ट्री (2017):
    ये फिल्म हिल स्टेशन पर रहने वाले पांच बच्चों की हैं जो एक कल्पवृक्ष को बचाना चाहते हैं. लेकिन कुछ लोग अपने निहितार्थों की वजह से इस पेड़ को काटने का इरादा रखते हैं. फिल्म की कहानी में पेड़ों को बचाने का संदेश बहुत ही खूबसूरती के साथ दिया गया है. इसे मणिका शर्मा ने डायरेक्ट किया है.

    4. जल (2013):
    यह कहानी कच्छ के रण में पानी ढूंढने वाले एक युवक की है जो पानी ढूंढता है. इस फिल्म के जरिये कई तरह के मसलों को छुआ गया है, लेकिन पानी के अलावा भी इसमें कई और मसलेआते हैं. 

    5. कौन कितने पानी में (2015):
    नील माधब पांडा की ये फिल्म बताती है कि अगर हमने आज पानी का सही से इस्तेमाल नहीं किया और संरक्षण नहीं किया तो कल हमें किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. बहुत ही हल्के-फुल्के अंदाज में फिल्म में दिखाया गया है कि अगर सब कुछ है लेकिन पानी नहीं तो कुछ भी नहीं है.


Reporter : ArunKumar,
RTI NEWS


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