​ ​ विश्‍व गौरैया दिवस: नीड़ के लिए भटकती चिरैया, अंगने को तेरा इंतजार, आ जा रे...
Monday, September 24, 2018 | 8:04:01 PM

RTI NEWS » News » Popular News


विश्‍व गौरैया दिवस: नीड़ के लिए भटकती चिरैया, अंगने को तेरा इंतजार, आ जा रे...

Tuesday, March 20, 2018 11:41:21 AM , Viewed: 359
  • नई दिल्लीः विश्‍व गौरैया दिवस का हमारा देश में विशेष है - ओ री चिरैया, नन्‍हीं सी चिडि़या अंगना में फिर आ जा रे। आओ कुछ करें- पर्यावरण संरक्षण सहित करने होंगे छोटे-छोटे प्रयास ताकि आंगन में लौट आए फुदके और चह-चहाए अपनी गौरैया। चूं चूं करती आई चिड़िया, चना का दाना लाई चिड़िया.घर आगन में फुदकती चिड़ियों की अठखेलियों की तस्वीर उकेरतीं ये लाइनें कुछ समय पहले तक वास्तविकता थी, लेकिन विकास के नाम पर हरियाली पर चला आरा अब इन्हें किताबों और लेखों में ले आया है। 20 मार्च को यानि आज विश्व गौरैया दिवस है। गौरैया का संरक्षण मनुष्य के हित से जुड़ा हुआ है। गौरैया का बचाव पर्यावरण को सुरक्षित करता है। सुनने में अलग है, लेकिन विश्व गौरैया दिवस पर हम आपको इस नजरिए से रूबरू करा रहा हैं।

    लाख टके का सवाल यह है कि जब हमने ही गौरैयों का चैन-सुकून छीन लिया है तो उनसे हमें सुकून मिल भी कैसे सकता है। बढ़ती गर्मी से बचने के लिए हमने एसी लगवा लिए तो घर के रोशनदान तक उनके लिए बंद हो गए। वर्ना घरों के रोशनदान, पुरानी इमारतों की दीवालों पर बने मुक्के ही उनके पनपने की सबसे महफूज जगह थे। उनसे उनकी जगह छिनी तो उन्होंने भी हमसे दूरी बना ली।

    ब्रह्मनाल के सूरज कपूर कहते हैं अब से 25-30 साल पहले से की तुलना में देखें तो गौरोयों की मौजूदगी बीस फीसदी से भी कम रह गई होगी। पशु पक्षियों के लिए खासतौर पर काम करने वाले काशी मुक्ता फाउंडेशन के विशाल यादव के अनुसार गौरैया और हमारा साथ बिल्कुल पारिवारिक था। गौरैया हमारे परिवार के सदस्यों की भांति ही थीं। मुझे अच्छी तरह याद है मेरे बचपन में मेरी दादी रोज सुबह, दोपहर और शाम को चिड़ियों के लिए दाना, पानी रखा करती थीं। घर के बारामदे में बाकायदा उनके लिए जगह तय थी। चिड़ियों को भी पता था उनके लिए वहां कब कब खाना पानी मिलने वाला है। वहां आने वाली चिड़ियों में गौरैया सबसे अधिक होती थीं साथ ही तोता, मैना, कबूतर भी हुआ करते थे।

    गौरैयों पर शोध करने वाली डा. अमृता घोषाल कहती हैं सिलिंग फैन के चलन में आने के बाद गौरैयों का बड़े स्तर पर खात्मा हुआ। उन्हें अपने शोध के दौरान शहर के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले तीन हजार परिवारों संवाद किया था और इनमें से 2174 लोगों ने माना था कि उनके घर में गौरैया पंखे से कटी है। इस आधार पर देखा जाए तो गौरैयों की बहुत बड़ी आबादी सिलिंग फैन का शिकार हो गई।

    सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह कहते हैं शुक्र हैं अब भी पूरी तरह गौरैया समाप्त नहीं हुई है। बीस मार्च को गौरैया दिवस के अवसर को विशेष रूप से ध्यान में रखते हुए मैं यही चाहूंगा कि लोग अपने-अपने घरों की खिड़की के बाहर दाना और पानी की कटोरियां जरूर लटका दें। बांसफाटक निवासी पं. शीतला प्रसाद पांडेय ने अपने भवन की छत पर चिड़ियों के लिए खास माहौल बना रखा है। उन्होंने बोंसाइ पीपल और कुछ अन्य वृक्षों की बोंसाइ नस्ल गमलों  में लगा रखी है। चिड़ियों के पानी पीने का पात्र जगह-जगह रखा है तो उनके लिए दाना की व्यवस्था भी पर्याप्त रहती है।

    इन कारणों से गौरैया पर आई आफत
    -आधुनिक घरों में गौरैया के रहने के लिए जगह नहीं
    -घर में अब महिलाएं न तो गेहूं सुखाती हैं न ही धान कूटती हैं जिससे उन्हें छत पर खाना नहीं मिलता
    -घरों में टाइल्स का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा
    -खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ गया है जिसका असर गौरैया पर पड़ रहा है। 80 फ़ीसदी कम हुई गौरैया

    पक्षी विज्ञानी हेमंत सिंह के मुताबिक गौरैया की आबादी में 60 से 80 फीसदी तक की कमी आई है। यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले।

    ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसायटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस’ ने भारत से लेकर विश्व के विभिन्न हिस्सों में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययनों के आधार पर गौरैया को ‘रेड लिस्ट’ में डाला है। आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक गौरैया की आबादी में करीब 60 फीसदी की कमी आई है। यह ह्रास ग्रामीण और शहरी..दोनों ही क्षेत्रों में हुआ है।

    पश्चिमी देशों में हुए अध्ययनों के अनुसार गौरैया की आबादी घटकर खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है।

    इसलिए मनाया जाता है गौरैया दिवस
    सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद मोहम्मद ई दिलावर ने कहा की गौरैया लुप्त हो रही है। उसको बचाने के लिए और लोगों में जागरूकता फ़ैलाने के लिए गौरैया दिवस दुनिया भर में 20 मार्च को मनाया जाता है।

    नन्हीं चिड़िया के लिए करें ऐसे
    मोहम्मद ई दिलावर ने कहा कि लोगों में गौरैया को लेकर जागरूकता पैदा किए जाने की जरूरत है क्योंकि कई बार लोग अपने घरों में इस पक्षी के घोंसले को बसने से पहले ही उजाड़ देते हैं। कई बार बच्चे इन्हें पकड़कर पहचान के लिए इनके पैर में धागा बांधकर इन्हें छोड़ देते हैं। इससे कई बार किसी पेड़ की टहनी या शाखाओं में अटक कर इस पक्षी की जान चली जाती है।

    आप अपने घर में दे जगह गौरैया लौटेगी
    पक्षी विज्ञानी के अनुसार गौरैया को फिर से बुलाने के लिए लोगों को अपने घरों में कुछ ऐसे स्थान उपलब्ध कराने चाहिए जहां वे आसानी से अपने घोंसले बना सकें और उनके अंडे तथा बच्चे हमलावर पक्षियों से सुरक्षित रह सकें।

    लविवि के जुलॉजी डिपार्टमेंट ने किया सर्वे लखनऊ में कुल 2767 गौरैया
    लखनऊ विश्वविद्यालय में जंतु विज्ञान विभाग की रीडर डॉ अमिता कन्नौजिया और उनके स्टूडेंट्स ने 8 जगहों पर गौरेया की संख्या जानने के लिए गणना की। इसमें चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि जो ग्रामीण क्षे़त्र थे वहां पर गौरेया की संख्या बेहद कम पाई गई बजाए शहरी इलाके में। इसका सबसे बड़ा कारण यह माना
    गया कि गांव अब आधुनिक हो रहा है जिससे वहां गौरेया पर संकट मंडराने लगा है।

    गौरैया को समर्पित कर दिया है इन्होंने अपना घर
    लखनऊ के आलमबाग निवासी सुरेंद्र पाण्डेय ने तो अपना पूरा घर गौरैया के नाम कर दिया है। अपने बगीचे में 15 रेडीमेड घोंसले बनाए हैं जो गौरैया के लिए हैं। लकड़ी, मटके, कागज के डिब्बे से बनाए गए इन घोंसलों में सुबह-शाम चिड़िया की चूं चूं सुनाई पड़ती है। वह बताते हैं कि उनके पिता शंभूनाथ पाण्डेय ने जब घर में बड़ी सी बगिया बनाई तो उसमें गके रहने के लिए घर बनाए। मैने उनको ऐसा
    करते हुए देखा तो मुझे भी अच्छा लगने लगा। मैने भी गौरैया को दाना डालना और उनके लिए आंगन में पानी रखना शुरू कर दिया।

    गौरैया के बारे में
    -गौरैया दिवस 20 मार्च 2010 को नेचर फाइबर सोसायटी के द्वारा मनाया गया
    -गौरैया का जीवन काल 11 से 13 वर्ष होता है
    -यह समुद्र तल से 1500 फीट ऊपर तक पाई जाती है
    -गौरैया पर्यावरण में कीड़ों की संख्या को कम करने में मदद करती है
    -ऐसे बुलाएं गौरैया को अपने आंगन अपने
    घर के छत पर ऐसी जगह जूते का डिब्बा, मटका और लकड़ी का बक्सा रखें जहां पर गौरैया तो जा सके लेकिन वहां पर बिल्ली और कुत्ता न पहुंच पाएं.

    क्या कहते है वैज्ञानिकों का?
    वैज्ञानिकों का कहना है कि मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगें उनकी प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। वाहनों से निकलने वाले धुएं का भी प्रभाव गौरैया की जीवनशैली पर पड़ रहा है।

    इस तरह बचा सकते हैं गौरैया
    - गर्मी के दिनों में अपने घर की छत पर एक बर्तन में पानी भर कर रखें।
    - गौरैया को खाने के लिए कुछ अनाज छतों व पार्को में रखें।
    - कीटनाशक का प्रयोग कम करें।
    - अपने वाहन को प्रदूषण मुक्त रखें।
    - हरियाली बढ़ाएं।
    - घोसलों के स्थान पर पात्र में कुछ खाद्य पदार्थ रखें।

    लखनऊ जू में मनाया जाएगा विश्व गौरैया दिवस
    20 मार्च को यानि आज विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान में विश्व गौरैया दिवस धूमधाम से मनाया जाएगा। गौरैया संरक्षण के जागरुकता कार्यक्रम के तहत प्राणि उद्यान के दोनों गेटों पर गौरैया के घोसलों को दर्शकों को बेचे जाएंगे। इसके अलावा दर्शकों को गौरैया की उपयोगिता के बारे में भी बताया जाएगा।



Reporter : ArunKumar,
RTI NEWS


Disclaimer : हमारी वेबसाइट और हमारे फेसबुक पेज पर प्रदर्शित होने वाली तस्वीरों और सूचनाएं के लिए किसी प्रकार का दावा नहीं करते। इन तस्वीरों को हमने अलग-अलग स्रोतों से लिया जाता है, जिन पर इनके मालिकों का अपना कॉपीराइट है। यदि आपको लगता है कि हमारे द्वारा इस्तेमाल की गई कोई भी तस्वीर आपके कॉपीराइट का उल्लंघन करती है तो आप यहां अपनी आपत्ति दर्ज करा सकते हैं- rtinews.net@gmail.com

हमें आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है। हम उस पर अवश्य कार्यवाही करेंगे।


दूसरे अपडेट पाने के लिए RTINEWS.NET के Facebook पेज से जुड़ें। आप हमारे Twitter पेज को भी फॉलो कर सकते हैं।