​ ​ Read: 39 भारतीयों मौत का Flash Back, बादोश में मिले शव, भारत में मातम
Friday, July 20, 2018 | 4:10:34 PM

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Read: 39 भारतीयों मौत का Flash Back, बादोश में मिले शव, भारत में मातम

Wednesday, March 21, 2018 09:49:24 AM , Viewed: 167
  • नई दिल्ली: विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मंगलवार को इराक में 2014 में लापता हुए 39 भारतीयों की मौत की पुष्टि की। इनमें पंजाब के 27, हिमाचल प्रदेश के चार, बिहार के छह और पश्चिम बंगाल के दो नागरिक शामिल हैं। हिमाचल प्रदेश के मृतकों के नाम अमन कुमार, संदीप सिंह राणा, इंद्रजीत और हेम राज हैं। पश्चिम बंगाल से समर तिकदर और खोखन सिकदर थे, तो बिहार के नागरिकों के नाम संतोष कुमार सिंह, विद्या भूषण तिवारी, अदालत सिंह, सुनील कुमार कुशवाह, धर्मेद्र कुमार और राजू कुमार यादव हैं। राजू कुमार यादव को छोड़कर अन्य सभी के शवों की पहचान डीएनए नमूनों के आधार पर कर ली गई है।

    सुषमा ने संवाददाताओं को बताया कि यादव के परिजनों की मौत हो जाने के कारण उनके रिश्तेदार द्वारा डीएनए नमूना भेजा गया था। इसलिए यादव का शव मात्र 70 फीसदी पहचाना गया। आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट द्वारा जून 2014 में इराक के मोसुल शहर पर कब्जा करने के बाद वहां काम करने वाले ये सभी भारतीय लापता हो गए थे।

    मरने वाले 39 भारतीयों की सूची इस प्रकार हैः
     1 * धरमेंद्र कुमार (पंजाब)
     2 * हरीश कुमार (पंजाब)
     3 * हरसिमरनजीत सिंह (पंजाब)
     4 * कंवलजीत सिंह (पंजाब)
     5 * मलकीत सिंह (पंजाब)
     6 * रंणजीत सिंह (पंजाब)
     7 * सोनू (पंजाब)
     8 * संदीप कुमार (पंजाब)
     9 * मनजिंदर सिंह (पंजाब)
    10 * गुरचरण सिंह (पंजाब)
    11 * बलवंत राय (पंजाब)
    12 * रूप लाल (पंजाब)
    13 * देविंदर सिंह (पंजाब)
    14 * कुलविंदर सिंह (पंजाब)
    15 * जतिंदर सिंह (पंजाब)
    16 * निशान सिंह (पंजाब)
    17 * गुरदीप सिंह (पंजाब)
    18 * कमलजीत सिंह (पंजाब)
    9 * गोबिंदर सिंह (पंजाब)
    20 * प्रीतपाल शर्मा (पंजाब)
    21 * सुखविंदर सिंह (पंजाब)
    22 * जसवीर सिंह (पंजाब)
    23 * परविंदर कुमार (पंजाब)
    24 * बलवीर चंद (पंजाब)
    25 * सुरजीत मैंका (पंजाब)
    26 * नंद लाल (पंजाब)
    27 * राकेश कुमार (पंजाब)
    28 * अमन कुमार (हिमाचल प्रदेश)
    29 * संदीप सिंह राणा (हिमाचल प्रदेश)
    30 * इंदरजीत (हिमाचल प्रदेश)
    31 * हेम राज (हिमाचल प्रदेश)
    32 * समर टीकदर (पश्चिम बंगाल)
    33 * खोखां सिकदर (पश्चिम बंगाल)
    34 * संतोष कुमार सिंह (बिहार)
    35 * विद्या भूषण तिवारी (बिहार)
    36 * अदालत सिंह (बिहार)
    37 * सुनील कुमार कुशवाहा (बिहार)
    38 * धर्मेंद्र कुमार (बिहार)
    39 * राजू कुमार यादव (बिहार)( सत्यापन किया जाना बाकी)   


    इराक में 39 भारतीयों का कत्लेआम से भारत में मचा हा-हाकार..!


    जिस वक्त इराक में हालात बहुत ज़्यादा खराब थे और मोसुल और आसपास के इलाक़ों में ISIS का कब्ज़ा था, उस वक्त इन भारतीय लोगों से संबंधित जानकारी हासिल करना संभव नहीं था. लेकिन जैसे ही 2017 में इराकी सेना ने मोसुल को ISIS के आतंकवादियों से आज़ाद करवाया, भारत सरकार ने युद्ध स्तर पर 39 नागरिकों की खोज शुरु कर दी. इसके लिए विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह को मोसुल भेजा गया. जहां उन्होंने, इराक में भारत के राजदूत और इराकी अफसरों के साथ मिलकर, तथ्यों की पड़ताल की. और फिर जो सच सामने आया, वो आज पूरे देश को ध्यान से सुनना चाहिए.

    हरजीत मसीह का दावा
    इनमें से 31 पंजाब के, चार हिमाचल प्रदेश के और बाकी बिहार और पश्चिम बंगाल से थे. मारे गए सभी लोग तारिक नूर अल हुदा कंपनी में काम करते थे. वहां से भागने में सफल रहे हरजीत मसीह ने पंजाब पहुंचने के बाद दावा किया था कि "सभी अगवा भारतीयों को आईएस के लड़कों ने गोली मारकर जान ले ली है." उन्होंने यह दावा 2015 में किया था. उस समय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने हरजीत के दावों को ग़लत बताया था.
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    क्या हुआ था?

    मूसल में चरमपंथियों ने साल 2014 में 80 लोगों का अपहरण कर लिया था जिनमें से 40 भारत के थे और 40 बांग्लादेश के. उनके अपहरण के बाद से भारत सरकार उनकी हत्या की बात को समय-समय पर नकारती रही. साल 2017 में सभी लापता लोगों के परिजनों से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मुलाकात की थी. इस मुलाक़ात के दौरान विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह भी मौजूद थे. इसके बाद वो इराक़ भी गए थे.
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    मूसल की कहानी
    इराक़ के दूसरे सबसे बड़े शहर मूसल पर जून 2014 में ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन ने कब्ज़ा जमा लिया था. उसे नियंत्रण में लेने के लिए इराक़ी सेना के हजारों सैनिक, कुर्द पेशमर्गा लड़ाके, सुन्नी अरब आदिवासी और शिया विद्रोही लड़ाकों ने आईएस के लड़कों से लोहा लिया था. उनकी इस लड़ाई में अमरीकी वायुसेना उन्हें मदद कर रही थी. चरमपंथियों ने शहर के प्रमुख रास्तों पर बैरीकेड बनाए थे और इमारतों को ढहा दिया था ताकि सुरक्षाबलों को आते हुए देखा जा सके. लंबी लड़ाई के बाद 2017 में इराक़ के प्रधानमंत्री हैदर अल-अबादी ने मूसल को आईएस के कब्ज़े से मुक्त होने की घोषणा की थी.
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    मूसल पर युद्ध का क्या असर हुआ?
    युद्ध में मूसल को काफी नुक़सान हुआ. लाखों लोग शहर छोड़कर भाग गए, वहीं हजारों मारे गए. चरमपंथियों ने शहर को तबाह कर दिया. इमारतों, मस्जिदों, पुलों को को ढहा दिया. युद्ध के दौरान हवाई हमलों में पूरा शहर मलबे में तब्दील हो गया. मलबे में कई दिनों तक सैंकड़ों लोग फंसे रहे. उन्हें सैनिकों ने निकाला, कुछ मलबे में ही मर गए.

    इस पूरे घटनाक्रम के Flash Back
    आज इस पूरे घटनाक्रम के Flash Back में जाना भी ज़रुरी है. ताकि आप ये समझ सकें, ये सच बाहर आने में इतना वक्त क्यों लग गया ? जून 2014 को 30 लाख की आबादी वाले मोसुल शहर पर ISIS के आतंकवादियों ने कब्ज़ा कर लिया था. शुरुआत में ISIS के सिर्फ 1300 आतंकवादियों ने लड़ाई शुरू की थी. लेकिन कुछ ही महीनों के अंदर आतंकवादियों की संख्या हज़ारों में पहुंच गई. सितंबर 2014 तक मोसुल शहर में ISIS के क़रीब 31 हज़ार आतंकवादी घुस चुके थे. उस वक्त इराक की सेना के मुकाबले मोसुल में, आतंकवादियों की संख्या का अनुपात 8 के मुक़ाबले एक का था. इराकी सैनिकों की संख्या... आतंकवादियों के मुकाबले 8 गुना ज़्यादा थी. लेकिन इसके बावजूद इराकी सेना हार गई थी.

    2014 में जब मोसुल पर ISIS का कब्ज़ा हुआ, तो इसे आतंकवादियों ने अपनी सबसे बड़ी सफलता माना था. ISIS के प्रमुख अबु बक्र अल बगदादी ने मोसुल की ही, अल-नूरी मस्जिद से खुद को खलीफा घोषित किया था. इस शहर को आज़ाद करवाने के लिए दो बड़ी लड़ाइयां हुईं. सुरक्षाबलों के जवानों ने इस शहर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से से आतंकवादियों के खिलाफ युद्ध शुरू किया. इराकी और कुर्दिश सैनिकों को अमेरिका का भी पूरा समर्थन मिल रहा था. मार्च 2017 से आतंकवादियों के खिलाफ ये लड़ाई और तेज़ हुई. और फिर अगले 4 महीनों में ISIS के आतंकवादियों पर 56 बार Air Strikes की गईं. अप्रैल के आखिर तक इराकी फौज ने मोसुल के एक बड़े हिस्से पर वापस कब्ज़ा कर लिया था. और ISIS के आतंकवादी सिर्फ शहर के पुराने हिस्से में ही मौजूद थे. लेकिन वहां भी हज़ारों आम नागरिक फंसे हुए थे. यही वजह है कि पूरे मोसुल पर दोबारा कब्ज़ा पाने में बहुत से आम नागरिक भी मारे गए. 9 महीने की लड़ाई के बाद इराकी सेना ने मोसुल पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया.
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    लेकिन, मोसुल से उत्तर-पश्चिम की दिशा में 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित Badush में ISIS के आतंकवादियों ने जैसा नरसंहार किया, उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. यहां आपको एक बार फिर से बता दें, कि Badush वही इलाका है, जहां से 39 भारतीयों के शव मिले हैं. और ये भी कहा जा रहा है, कि उनकी हत्या करने से पहले आतंकियों ने उन्हें Badush की जेल में क़ैद करके रखा था.

    ईराक के Rudaw Media Network ने 8 मार्च 2017 को एक लेख छापा था. जिसमें विस्तार से जानकारी दी गई थी, कि कैसे ISIS ने आम लोगों की निर्मम हत्या की. जिस दिन ISIS ने इस जेल पर कब्ज़ा किया था, उससे एक रात पहले, जेल के Guards मारे जाने के डर से वहां से भाग गए थे. हालांकि, भागने से पहले उन्होंने जेल के दरवाज़ों को Lock कर दिया था. ताकि कोई क़ैदी वहां से भाग ना सके. बाद में ISIS ने जेल को अपने कब्ज़े में कर लिया, इस दौरान कई लोग भागने में कामयाब हो गए, लेकिन जो नहीं भाग पाए, वो मारे गए.

    इसके बाद ISIS के आतंकी क़रीब डेढ़ हज़ार क़ैदियों को Badush से ट्रक में लादकर किसी दूसरे स्थान पर ले गए. जहां उन्होंने सुन्नी मुसलमानों को दूसरे बंधकों से अलग कर दिया. और बाद में आतंकियों ने Badush जेल के 670 लोगों की एक साथ हत्या कर दी थी. जिनमें से ज़्यादातर शिया, कुर्द, यज़ीदी और दूसरे धर्मों से ताल्लुक रखते थे. ध्यान देने वाली बात ये है, कि ISIS के आतंकवादियों ने हत्या करने से पहले लोगों से उनका धर्म पूछा था. मार्च 2017 में इसी Badush जेल से 500 लोगों की सामूहिक कब्र मिली थी.

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    यानी जेल में क़ैदियों की हत्या करने के बाद ISIS के आतंकवादियों ने कुछ लोगों को जेल के Compound में ही दफ्न कर दिया. और कुछ लोगों को Badush के आस-पास मौजूद इलाकों में दफ्न किया गया. हो सकता है, कि उन्हीं लोगों में 39 भारतीय नागरिक भी शामिल हों.  39 भारतीयों की हत्या ISIS के आतंकवादियों ने की और इन आतंकवादियों का सरगना अल बगदादी भी भारतीयों की हत्या का ज़िम्मेदार है.. उसने वर्ष 2014 में मोसुल की एक मस्ज़िद से भाषण देकर खुद को खलीफा घोषित किया था .

    मज़हबी कट्टरपंथ ही ISIS की सबसे बड़ी नीति है. लेकिन इस कट्टरवाद की असली वजह क्या है?  इतिहास में कई ऐसी घटनाएं मिलती हैं जिनसे ये पता चलता है कि किस तरह बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया और निर्दोष लोगों का कत्ल कर दिया गया. ये कत्ले-आम.. यूरोप और पश्चिमी एशिया से लेकर भारत तक हो रहा था.

    इस कत्लेआम के पीछे की विचारधारा को Expose करने वाली किताब है आदि तुर्क कालीन भारत... इस किताब के पेज नंबर 153 और 154 पर 13वीं शताब्दी के इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी के विचार लिखे हुए हैं . ज़ियाउद्दीन बरनी के नाना हुसामुद्दीन, गुलाम वंश के सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के सहयोगी और सिपेह-सालार थे . ये वो इतिहासकार हैं जो इस्लाम के भी विद्वान थे . इस तरह के विद्वानों और इतिहासकारों की बातों का बादशाहों और सुल्तानों पर भी गहरा असर होता था .

    ये एक प्रामाणिक किताब है इस पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मुहर है . किसी विषय पर प्रामाणिक किताबें हमेशा बहुत कम होती हैं . और हमने हमेशा आपके सामने प्रामाणिक किताबों का अध्ययन करने के बाद ही इतिहास को प्रस्तुत किया है . ताकि आप सही और गलत के फर्क को अच्छी तरह समझ सकें .

    इस किताब के पेज नंबर 153 और 154 पर ज़ियाउद्दीन बरनी के विचार दर्ज हैं . उसके अनुसार
    यदि शिर्क और कुफ्र जड़ पकड़ गए हों और सभी काफ़िरों और मुशरिकों को पूर्णतया उखाड़ फेंकना संभव नहीं हो तो कम से कम ये तो होना ही चाहिए कि इस्लाम के कारण और दीन पनाही के लिए मुशरिक और बुतपरस्त हिंदुओँ को अपमानित, कलंकित और तुच्छ बनाने का विशेष प्रयत्न करते रहें क्योंकि वो खुदा और रसूल के घोर शत्रु हैं . बादशाहों की दीन पनाही का सबसे बड़ा चिन्ह यह है कि वो जब किसी हिंदू को देखें तो उनका मुंह लाल हो जाए और अच्छा हो कि उसको जीवित नष्ट कर दें . ब्राह्मणों का जो कि कुफ्र के इमाम (नेता) हैं और जिनके कारण कुफ्र और शिर्क फैलता है और कुफ्र की आज्ञाओं का पालन कराया जाता है, समूल उच्छेदन कर दिया जाए . इस्लाम के सम्मान और दीने हकीकी (सच्चे धर्म) के सम्मान के लिए ये आवश्यक है कि किसी काफिर और मुशरिक को आदर पूर्वक जीवन व्यतीत ना करने दिया जाए और मुसमलानों के बीच में उसका अपमान और तिरस्कार होता रहे . उसे संतोष, इत्मिनान और चैन का जीवन प्राप्त नहीं हो . मुशरिकों और बुतपरस्तों को किसी कौम, समूह, विलायत और अक्ता का हाक़िम नहीं बनाया जाए . इस्लामी बादशाह के ऐश्वर्य और वैभव के कारण खुदा और रसूल के शत्रुओं में से एक भी निश्चिन्तिता से पानी तक ना पी सके और ना संतोष की शय्या पर पैर फैला कर सो सके .

    आज हमने इस इतिहास का एक बहुत संक्षिप्त हिस्सा आपके साथ शेयर किया है. लेकिन ये हिस्सा भी ये समझने के लिए काफी है कि किस तरह पूरी दुनिया में मज़हबी कट्टरपंथ के विचारों का पालन पोषण किया गया. और यही वजह है कि आज भी मज़हब के नाम पर नरसंहार किए जाते हैं और निर्दोष लोगों का खून बहाया जाता है.

Reporter : ArunKumar,
RTI NEWS


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