​ ​ 39 भारतीयों की मौतः इराक से दिल्ली तक श्रद्धांजली, कटघरे में मोदी सरकार..!
Friday, July 20, 2018 | 4:16:16 PM

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39 भारतीयों की मौतः इराक से दिल्ली तक श्रद्धांजली, कटघरे में मोदी सरकार..!

Friday, March 23, 2018 01:39:17 AM , Viewed: 201
  • नई दिल्लीः फ्रांस ने इराक में 39 भारतीयों की मौत पर शोक जताया है। फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को बयान जारी कर कहा, "फ्रांस पीड़ितों के परिवार व उनके चाहने वालों के साथ भारतीय प्रशासन के प्रति संवेदना जताता है।" बयान के अनुसार, "हम इराक प्रशासन की जांच की सराहना करते हैं, जिससे सच का पता लगाना संभव हो सका कि ये पीड़ित आतंकवाद का शिकार हुए हैं।"

    बयान के अनुसार, "फ्रांस आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और शांति व स्थिरता बहाली के लिए अपने भारत और इराक के साथ मुस्तैदी से खड़ा है।"

    39 भारतीयों को दिल्ली विधानसभा में दी गई श्रद्धांजलि
    मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इराक में बंधक बनाकर हुई 39 भारतीयों की हत्या पर शोक व्यक्त किया। दिल्ली विधानसभा में दो मिनट का मौन रखकर मृतकों को श्रद्धांजलि दी गई। केजरीवाल ने ट्वीट किया, इराक में बंधक बनाए गए 39 भारतीयों की मौत के बारे में जानकर काफी दुख हुआ। पूरा देश मृतकों के परिजनों के साथ खड़ा है। विधानसभा में अध्यक्ष राम निवास गोयल ने एक शोक संदेश पढ़ा, यह काफी दुखद है कि करीब तीन साल बाद हमें जानकारी मिली है कि इराक में बंधक बनाए गए 39 भारतीय मारे गए। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में कहा कि करीब तीन साल पहले इराक में बंधक बनाए गए सभी 39 भारतीय मारे गए और उनके शव बरामद किए गए हैं।

    इराक में 39 भारतीयों का कत्लेआम से भारत में मचा हा-हाकार..!


    स्वराज ने सदन में कहा कि इराक के मोसुल से आतंकी संगठन आईएसआईएस ने 40 भारतीय को बंधक बना लिया था, जिसमें से एक खुद को बांग्लादेश से आया मुस्लिम बताकर वहां से बच निकला था, बाकी 39 भारतीयों को बदूश ले जाकर मार डाला गया।

    सरकार का रवैया सही क्यों नहीं कहा जा सकता?
    आखिर चार साल की अनिश्चितताओं के बाद इराक में लापता हुए 39 भारतीयों की मौत की पुष्टि हो ही गई. इस घटना ने एक बार फिर सबका ध्यान उन लोगों की तरफ दिलाया है जो संकटग्रस्त क्षेत्रों में काम करते हैं. लेकिन साथ ही इस त्रासदी में सरकार के लिए भी एक बड़ा सबक छिपा है, सबक यह कि उसे ऐसे संवेदनशील मामलों को किस तरह संभालना चाहिए.

    यह जून, 2014 की बात है जब इन 39 लोगों के परिजनों को खबर मिली थी कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंकियों ने इनका अपहरण कर लिया है. इन चार सालों में कई बार ऐसा हुआ जब भारतीय नागरिक विदेशों में आतंकवादियों के चंगुल में फंसे. और ज्यादातर मौकों पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पूरी तत्परता दिखाते हुए इन लोगों की सुरक्षित रिहाई के लिए सफल बचाव अभियान चलाए. यह जुलाई 2014 की बात है जब बिचौलियों की मदद से आईएस के चंगुल में फंसी 46 नर्सों को रिहा करवाया गया था. फिर 2015 में फादर एलेक्सिस प्रेम कुमार और 2016 में एक और सामाजिक कार्यकर्ता जुडिथ डिसूजा को तालिबान की कैद से छुड़वाया गया. बीते साल सितंबर में फादर टॉम उझुन्नालिल को आईएस ने 17 महीनों तक कब्जे में रखने के बाद छोड़ दिया था.

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    इन सब उदाहरणों के बीच इराक में आईएस आतंकियों द्वारा 39 भारतीय मजदूरों की हत्या यही बताती कि पश्चिम एशिया के एक बड़े इलाके में सुरक्षा की स्थिति बहुत नाजुक है. इससे यहां की छिन्न-भिन्न राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का भी अंदाजा मिलता है. यही वजह है कि यहां दूसरे देशों को राहत और बचाव अभियान चलाने के लिए अनौपचारिक संपर्क सूत्रों पर निर्भर रहना पड़ता है और उनके जरिए ही अपहृताओं से बातचीत होती है.

    इसमें कोई दोराय नहीं है कि भारत सरकार ने इन लोगों को खोजने और बचाने के लिए सभी उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल किया होगा. लेकिन इस बीच विदेश मंत्रालय की तरफ से छह वक्तव्य आए, यहां तक कि एक बार सुषमा स्वराज ने भी संसद में दावा किया कि सभी भारतीय बंधक जीवित हैं.


    यह दलील ठीक है कि सुषमा स्वराज इन लोगों के परिजनों को बेवजह तकलीफ नहीं पहुंचाना चाहती थीं. लेकिन अगर सरकार तथ्यों को आगे रखती और कहती कि बंधक लापता है और सरकार उन्हें खोजने की पूरी कोशिश कर रही है, तो यह रवैया ज्यादा संवेदनशील और सही होता. अगर मानवीय नजरिए और जरूरी औपचारिकताओं का ध्यान रखें तब भी इन 39 लोगों के परिजनों को इनकी मौत की खबर मीडिया के बजाय सरकार की तरफ से पहले मिलनी चाहिए थी.

    पश्चिम एशिया में जो हालात हैं, उनके चलते यहां भारतीय मजदूर भविष्य में भी ऐसे किसी संकट में फंस सकते हैं. तब सरकार राहत-बचाव अभियानों की सफलता तो याद रखे, लेकिन अगर यहां कोई त्रासदी घटित हो जाए, तो उसे वे गलती नहीं दोहरानी चाहिए जो इस बार की गईं.

Reporter : ArunKumar,
RTI NEWS


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